Kabir Ke Dohe- संत कबीर दास जी के दोहे अर्थ सहित

Sant Kabir Das Ji दुनिया के बुहत प्रसिद्ध कवि है। Kabir Ji के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से पैदा हुए थे, जिसको भूल से रामानंद जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था। Kabir Ke Dohe पूरी दुनिया मे प्रसिद्ध है। Kabir Ji के दोहे हमें जीवन जीने का सही रास्ता दिखाते है। अगर हम Kabir Ke Dohe अपने जीवन में लागु करते है तो हमारा जीवन शांति और सुख से भर जाएगा।

संत कबीर दास जी के दोहे(Kabir Ke Dohe)-

kabir ke dohe

काची काया मन अथिर थिर थिर  काम करंत।
ज्यूं ज्यूं नर  निधड़क फिरै त्यूं त्यूं काल हसन्त ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि मन चंचल और शरीर कच्चा है। परन्तु तुम इन्हें अनश्वर मानते हो। मनुष्य जितना इस संसार में मगन रहता है, निडर घूमता है,  उतना ही काल उस पर हँसता है। कितनी दुखभरी बात है कि मृत्यु पास है और यह जानकर भी इंसान अनजान बना रहता है।

तरवर तास बिलम्बिए, बारह मांस फलंत।
सीतल छाया गहर फल, पंछी केलि करंत ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि जो बारहों महीने फल देता हो, ऐसे वृक्ष के नीचे विश्राम करो। जिसकी छाया शीतल हो, फल सघन हों और जहां पक्षी क्रीडा करते हों, इस से मन को शांति मिलेगी।

मन मरया ममता मुई, जहं गई सब छूटी।
जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि मन को मार डाला ममता भी समाप्त हो गई। अहंकार सब नष्ट हो गया। जो योगी था, वह तो यहाँ से चला गया अब संसार में केवल उसका यश रह गया।

जानि बूझि साँचहि तजै, करै झूठ सूं नेह।
ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि जो झूठ से प्रेम करते हैं और जानबूझ कर सत्य का साथ छोड़ देते हैं। हे भगवान् ऐसे लोगों की संगति हमें स्वप्न में भी न देना। ऐसे लोगो की सांगत बुहत बुरी होती है।

कबीर संगति साध की , कड़े न निर्फल होई।
चन्दन होसी बावना , नीब न कहसी कोई ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि साधु की संगति कभी निष्फल नहीं होती। चन्दन का वृक्ष यदि छोटा भी हो तो उसे कोई भी नीम का वृक्ष नहीं कहेगा। वह चन्दन ही रहेगा और अपने परिवेश को सुगंध ही देगा। आपने आस-पास को खुशबू से ही भरेगा और के मन को अच्छा लगेगा।

ऊंचे कुल क्या जनमिया जे करनी ऊंच न होय।
सुबरन कलस सुरा भरा साधू निन्दै सोय ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि यदि उच्च कुल में जन्म लेने पर भी कार्य उच्च कोटि के नहीं हैं, तो इस से क्या लाभ? सोने का कलश यदि सुरा से भरा है तो दुनिया उसकी निंदा ही करेंगी ।

मूरख संग न कीजिए ,लोहा जल न तिराई।
कदली सीप भावनग मुख, एक बूँद तिहूँ भाई ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि मूर्ख का साथ मत दो । मूर्ख लोहे के जैसा  है जो जल में डूब जाता है तैर नहीं सकता। संगति का प्रभाव इतना पड़ता है, कि आकाश से एक बूँद केले के पत्ते पर गिर कर कपूर, सीप के अन्दर गिर कर मोती और सांप के मुख में पड़ कर विष बन जाती है।

क्काज्ल केरी कोठारी, मसि के कर्म कपाट।
पांहनि बोई पृथमीं,पंडित पाड़ी बात॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि यह संसार काजल की कोठरी जैसे है, इसके कर्म रूपी कपाट कालिमा के ही बने हुए हैं। पंडितों ने पृथ्वी पर पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित करके पूजा करने के मार्ग का निर्माण किया है। इस मार्गे से हम भगवान को प्राप्त कर सकते है।

बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय।
जो घर देखा आपना मुझसे बुरा णा कोय॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि मैं इस संसार में बुरे व्यक्ति की खोज करने चला था लेकिन मुझे बुरा कोई न मिला। लेकिन जब अपने घर, अपने मन में झाँक कर देखा तो खुद से बुरा कोई न पाया। अर्थात हम दूसरे की बुराई पर नजर रखते हैं, पर अपने आप को नहीं निहारते कि हम कितने बुरे है ।

झूठे को झूठा मिले, दूंणा बंधे सनेह।

झूठे को साँचा मिले तब ही टूटे नेह ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि जब झूठे आदमी को दूसरा झूठा आदमी मिलता है, तो उनमे बुहत प्रेम बढ़ता है। मगर जब झूठे को एक सच्चा आदमी मिलता है, तभी प्रेम टूट जाता है।

कबीर सो धन संचिए जो आगे कूं होइ।
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्या कोइ ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम दे। मतलब के भगवान के नाम का धन इकठा कर। संसार रूपी धन की गठरी बांधकर अपने साथ कोई नहीं लिजा सकता ।

मनहिं मनोरथ छांडी दे, तेरा किया न होइ।
पाणी मैं घीव नीकसै, तो रूखा खाई न कोइ ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि मन की इच्छा छोड़ दो। उन्हें तुम अपने बल पर पूरा नहीं कर सकते। वो तो दिन के साथ बढती जाती है। मुनिष्य के सोचने के जैसे, यदि जल से भी घी निकल आए, तो रोटी सुखी कोई भी न खाएगा।

करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय।
बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि यदि तू कर्म करते समय नहीं सोचता था। अब कर्म करके पश्चात्ताप क्यों कर रहा है। यदि तुने बबूल का लगाया है, फिर आम खाने को कहाँ से मिलेंगे ?

मन जाणे सब बात जांणत ही औगुन करै।
काहे की कुसलात कर दीपक कूंवै पड़े ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि मन सब बातों को जानता है पर फिर भी अवगुणों में फंस जाता है। उसकी कुशलता कैसी जो दीपक हाथ में पकडे हुए भी कुंए में गिर जाते है।

हू तन तो सब बन भया करम भए कुहांडि ।
आप आप कूँ काटि है, कहै कबीर बिचारि॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि यह शरीर तो जंगल के समान है। हमारे कर्म ही कुल्हाड़ी के समान हैं। इस प्रकार हम खुद अपने आपको काट रहे हैं। हमे कर्म करने से पहले सोच-बिचार करनी चाहिए।

सातों सबद जू बाजते घरि घरि होते राग।
ते मंदिर खाली परे बैसन लागे काग ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि जिन घरों में पल पल उत्सव मनाए जाते थे, सप्त स्वर गूंजते थे। वे घर भी अब खाली पड़े हैं। उन पर कौए बैठते हैं। हमेशा एक सा समय नहीं रहता। जहां खुशियाँ थी, वहां गम छा जाता है। यह इस संसार का नियम है।

कबीर रेख सिन्दूर की काजल दिया न जाई।
नैनूं रमैया रमि रहा  दूजा कहाँ समाई ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि जहां सिन्दूर की रेखा है। वहां काजल नहीं लगाया जा सकता। जब नेत्रों में राम विराज रहे हैं, तो वहां कोई और कैसे निवास कर सकता है?

जिहि घट प्रेम न प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम।
ते नर या संसार में , उपजी भए बेकाम ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि जिनके ह्रदय में न तो प्रीति है और न प्रेम का रस , जिनकी जिह्वा पर राम का नाम नहीं रहता। वे मनुष्य इस संसार में उत्पन्न हो कर भी व्यर्थ हैं। भगवान का प्रेम जीवन की सार्थकता है। भगवान के प्रेम रस में डूबे रहना जीवन का सार है।

कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई।
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई ॥

अर्थ: कबीर जी कहते हैं कि भगवान के प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पडा , जिससे अंतरात्मा तक भीग गई। आस पास पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया,  खुश हाल हो गया। यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है।

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Kabir Ke Dohe की बुहत बड़ी collection है और यह कभी ना खतम होने वाला ज्ञान है। अगर आपको यह Kabir Ke Dohe अच्छे और जीवन को सुख और शांति से भरने मे मदद करते है। तो आप इस पोस्ट को अपने दोस्ते और रिश्तेदारों से भी share करे और उनके जीवन को भी सुख और शांति से भर दे।

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